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एक परिचय


गीताप्रेसकी स्थापना सन् 1923 ई० में हुई थी। यह "गोबिन्द भवन कार्यालय" कोलकाता,जो कि दि वेस्ट बंगाल सोसाईटीज एक्ट 1961 में पंजीकृत है,की एक मुख्य शाखा है।

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गोरखपुरमें स्थित

गीताप्रेस-सेवादल: अतिवृष्टि, अनावृष्टि,भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदाओंके समय गीताप्रेस-सेवादल निःस्वार्थभावसे पीड़ितोंकी सेवा व सहयोग करता है। उत्तराखण्ड-भूकम्प,गोरखपुर-बाढ़(1998), उड़ीसा चक्रवात आदिमें इसका राहत कार्य प्रशंसनीय रहा है। कतलखाने जाती हुई कई गाएँ बचायी गयी हैं। सर्दीके महीनोंमें सेवादल गरम कपड़े भी बाँटता है ।

साधक-संघ: अनन्त-जन्मोंके पश्चात् प्राप्त हुए देवदुर्लभ मनुष्य-जन्मकी सफलता भगवत्प्राप्तिमें निहित है। आध्यात्मिकता भगवत्प्राप्ति-हेतु आवश्यक है। आध्यात्मिकताके बिना व्यक्ति, समाज और देशकी सच्ची प्रगति नहीं हो सकती। मानव यदि अपना तथा समूचे विश्वका कल्याण चाहता है तो उसे झूठ, हिंसा, व्यभिचार, चोरी, द्वेष, कपट आदि आसुरी प्रवृत्तियोंको छोड़कर सत्य, अहिंसा, सदाचार, सरलता आदि दैवी गुणोंका अर्जन करना पड़ेगा। समयकी अमूल्यताको पहचानकर जीवनके प्रत्येक क्षणको साधनामय बनाना होगा। प्रत्येक सदस्यको एक 'साधक-दैनन्दिनी' एवं एक 'आवेदन-पत्र' भेजा जाता है, साधकको प्रतिदिन नियम-पालनकी दैनिक तालिका दैनन्दिनीमें भरनी चाहिये ।

नाम-जप-विभाग: 'कलियुग केवल नाम आधारा' - कलिकालमें जन-समाजके उद्धारहेतु नाम- जप-विभाग लोगोंको भगवन्नामके लिये प्रेरित करता है। प्रतिवर्ष सबके कल्याणके लिये नाम-जप करनेका अनुरोध कल्याण-मासिकमें निकलता है। देश-विदेशके कई भाई-बहन नियमबद्ध नाम-जप करते हैं, और जपकी संख्या लिखकर भेजते हैं।

हस्त-निर्मित-वस्त्र-विभाग : समाजमें शुद्ध, चर्बीरहित, हाथसे बुना वस्त्र उपलब्ध करानेके उद्देश्यसे हस्त-निर्मित-वस्त्र-विभागकी स्थापना हुई। वस्त्र-विभाग हस्तनिर्मित व अन्य वस्त्र बनाता है। इनमें चर्बीका लेप नहीं दिया जाता। यह बढ़िया और अहिंसक वस्त्र उचित मूल्यपर गीताप्रेसके पाससे ही धोतियाँ, साड़ियाँ व थानके रूपमें उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा गोबिन्द भवन, गीता भवन और अन्य दूकानोंमें भी ये वस्त्र बिक्री किये जाते हैं।