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आयुर्वेद वेदोंका ही एक अंग है। यह मनुष्यको स्वस्थ रखनेकी पद्धति है, न केवल एक रोग मिटानेकी प्रक्रिया। हमारे पुरातन वैद्य केवल नाड़ी छूकर रोग बता देते थे । जड़ी-बूटी चखकर ही उसका उपयोग बता देते थे।
इस संस्थानका उद्देश्य इस प्राचीन आयुर्वेदका प्रचार है। यहाँ शास्त्रोंके अनुसार, हिमालयकी जड़ी-बूटियोंसे और गंगा-जलसे शुद्ध औषधियोंका निर्माण होता है । अशुद्ध औषधियाँ जैसे अरिष्ट और आसव यहाँ नहीं बनती। ये औषधियाँ गीता भवन, ऋषिकेश, गोबिन्द भवन, कोलकाता, गीताप्रेस, गोरखपुर व संस्थाकी अन्य दूकानों व बुक स्टालोंपर उपलब्ध रहती हैं। इन स्थानोंपर दातव्य औषधालय भी चलाये जाते हैं ।
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